असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इन दिनों काफी बेचैनी में हैं। राज्य में अगले साल अप्रैल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और उससे पहले ही वे चुनावी नैरेटिव गढ़ने में जुट गए हैं। उनकी रणनीति साफ है—मतदान को धार्मिक ध्रुवीकरण की तरफ मोड़ना। यानी चुनाव को हिंदू बनाम मुस्लिम की लड़ाई बनाना।

इसी मकसद से उन्होंने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और लोकसभा में पार्टी के नेता गौरव गोगोई पर निशाना साधा है। सरमा ने जांच समिति बनाकर गोगोई पर पाकिस्तान से रिश्तों का आरोप लगाया। दावा किया गया कि समिति को गंभीर सबूत मिले हैं, लेकिन आज तक कोई ठोस प्रमाण जनता के सामने नहीं रखे गए और न ही कोई कानूनी कार्रवाई की गई। साफ है कि यह असल में सबूतों की नहीं, बल्कि गोगोई को पाकिस्तानपरस्त और मुस्लिम समर्थक साबित करने की कोशिश है।
दरअसल, यह हमला सिर्फ गोगोई पर नहीं है, बल्कि पूरे चुनाव को सांप्रदायिक रंग देने की रणनीति का हिस्सा है। हाल ही में भाजपा ने एआई से तैयार एक वीडियो जारी किया जिसमें गुवाहाटी और अन्य शहरों को मुस्लिम बहुल दिखाकर यह प्रचार किया गया कि अगर भाजपा सत्ता में नहीं रही तो असम पूरी तरह मुस्लिम बहुल हो जाएगा। वीडियो में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को भी शामिल किया गया और संदेश दिया गया कि भाजपा ही इस “खतरे” को रोक सकती है।
विडंबना यह है कि असम में पिछले दस साल से भाजपा की सरकार है और केंद्र में भी ग्यारह साल से भाजपा सत्ता में है। “डबल इंजन” के नाम पर विकास की बातें खूब की गईं, लेकिन चुनावी मैदान में वही पुराना हथियार—मुसलमानों का डर—दोहराया जा रहा है। खुद प्रधानमंत्री मोदी हर सभा में “घुसपैठियों” को मुद्दा बना रहे हैं।
तो सवाल यह है कि भाजपा और मुख्यमंत्री सरमा को इतनी घबराहट क्यों है? क्या दस साल की सत्ता-विरोधी लहर का अंदेशा उन्हें परेशान कर रहा है? क्या गौरव गोगोई के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने से उनकी चिंता बढ़ी है? दरअसल, यह लड़ाई निजी भी है। लोकसभा चुनाव में सरमा ने पूरी ताकत झोंककर जोरहाट सीट से गोगोई को हराने की कोशिश की थी, लेकिन गोगोई करीब डेढ़ लाख वोट से जीत गए। इस जीत ने सरमा की बेचैनी और बढ़ा दी।
चुनाव परिणामों के बाद भाजपा विधायक मृणाल सैकिया ने सोशल मीडिया पर लिखा कि सिर्फ पैसा, बड़ा प्रचार और अहंकारी भाषा चुनाव नहीं जिता सकती। यह बात मुख्यमंत्री को नागवार गुज़री, लेकिन सैकिया ने साफ कहा कि यह भावना सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि पूरी पार्टी की है।
यानी मुख्यमंत्री ने चुनाव को निजी लड़ाई बना लिया है और धार्मिक ध्रुवीकरण में ही जीत की संभावना देख रहे हैं। हालांकि, यही दांव झारखंड में भाजपा के लिए उल्टा पड़ा। पार्टी के भीतर भी सवाल उठने लगे हैं कि जब 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया था तब ऐसी सांप्रदायिक रणनीति की जरूरत क्यों नहीं थी और अब क्यों इसे ही मुख्य हथियार बनाया जा रहा है?
