नवरात्र सोमवार से शुरू हो रहे हैं और शहर में कुट्टू का आटा, सामक के चावल व्रत रखने वाले लोग बड़ी मात्रा में खरीद रहे हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या इस बार भी लोगों की सेहत भगवान भरोसे ही रहेगी? अप्रैल में गुप्त नवरात्र के दौरान 28 से अधिक लोग कुट्टू का आटा खाने से बीमार हो गए थे। उस समय पेट दर्द, उल्टी और कंपकंपी से जूझते लोगों को अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा। बराड़ा, अंबाला शहर और मुलाना के उपासक उस लापरवाही की कीमत भुगत चुके हैं। लेकिन प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग की आंखें अब भी बंद हैं।

विभाग हर बार बीमारियों का इंतजार क्यों करता है?
हकीकत यह है कि बीते तीन साल से एक ही ढर्रा चला आ रहा है—जब तक लोग बीमार न हों, तब तक खाद्य सुरक्षा विभाग की गाड़ी चलती ही नहीं। जांच और कार्रवाई तब शुरू होती है जब मरीज अस्पतालों में भर्ती होने लगते हैं। नवरात्र शुरू होने से चंद घंटे पहले भी दुकानों पर बिक रहे व्रत के सामान की जांच तक शुरू नहीं की गई है।
जिम्मेदारी से भागता प्रशासन
फूड सेफ्टी ऑफिसर डॉ. आजाद से इस बाबत संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब देना भी जरूरी नहीं समझा। सवाल यह है कि जब 28 लोग पहले ही जहरीला आटा खाने से बीमार हो चुके हैं, तो इस बार प्रशासन किसका इंतजार कर रहा है? क्या फिर से किसी हादसे के बाद अधिकारी फाइलें पलटेंगे और बयान देंगे?

जनता के लिए चेतावनी, विभाग के लिए सवाल
लोग अब डर के कारण ब्रांडेड पैकेट खरीदने को मजबूर हैं। लेकिन क्या सिर्फ ब्रांडेड लेबल ही सेहत की गारंटी है? अगर सरकार और विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाते, तो दुकानों पर रखा हर पैकेट सुरक्षित होता।
कटाक्ष यह है कि विभाग का रवैया ऐसा हो गया है मानो जनता की जान से खेलना उसकी आदत बन चुकी हो। नवरात्र आस्था का पर्व है, लेकिन प्रशासन की यह घोर लापरवाही इसे फिर से संकट का पर्व न बना दे।
