बिहार विधानसभा चुनाव में कुछ ही महीने शेष हैं और विपक्षी महागठबंधन ने चुनावी अभियान को गति देने के लिए यात्राएं और रैलियों की शुरुआत की है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी राज्यव्यापी यात्रा पर हैं और उनके साथ राजद नेता तेजस्वी यादव, सीपीआई (माले) के दीपांकर भट्टाचार्य और वीआईपी पार्टी के मुकेश सहनी भी कदम से कदम मिला रहे हैं। सोमवार को प्रियंका गांधी वाड्रा की यात्रा में शामिल होना इस कोशिश को और मजबूती देने वाला माना गया।

हालांकि यह सबकुछ होते हुए भी विपक्षी गठबंधन के भीतर मतभेद और तनाव खत्म होने की बजाय और गहराता दिख रहा है। इस राजनीतिक खिंचातानी का असर अब जमीन पर भी दिखने लगा है — पटना के गांधी मैदान में प्रस्तावित विपक्षी महारैली को अचानक स्थगित कर दिया गया।
रैली रद्द, लेकिन कारण अस्पष्ट
आधिकारिक तौर पर कहा गया कि चूंकि सीमांचल के आरा में रैली आयोजित की जा रही है, इसलिए पटना की जरूरत नहीं रही। कुछ नेता यह भी कह रहे हैं कि अब रैली की जगह एक लाख लोगों का पैदल मार्च कराया जाएगा। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि रैली स्थगन की असली वजह, महागठबंधन के भीतर तेजस्वी यादव को लेकर उपजे असंतोष में छुपी है।
मुख्यमंत्री पद को लेकर खिंचाव
सूत्रों के अनुसार, राजद के नेता इस बात से खिन्न हैं कि राहुल गांधी ने सार्वजनिक मंच से तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया। जबकि इससे पहले तेजस्वी खुद राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बता चुके हैं। सीमांचल दौरे के दौरान जब राहुल से इस विषय में सवाल पूछा गया, तो उन्होंने सीधा जवाब देने से परहेज़ किया।
कांग्रेस के रुख से असंतुष्ट राजद ने, कथित रूप से, कांग्रेस को सूचित कर दिया कि यदि गांधी मैदान में रैली करनी है तो उसे अकेले करनी होगी। इससे कांग्रेस नेतृत्व असमंजस में पड़ गया, क्योंकि पार्टी जानती है कि राजद और उसके सहयोगियों के बिना इतनी बड़ी रैली सफल नहीं हो सकती।
गठबंधन की गांठें और उलझीं
राजद के रुख के बाद कांग्रेस को न सिर्फ रैली रद्द करनी पड़ी, बल्कि अन्य सहयोगी दलों का समर्थन भी संदेह के घेरे में आ गया। वामपंथी दलों की रणनीतिक नज़दीकी भले कांग्रेस से हो, लेकिन उनका तालमेल राजद से होता है। वहीं वीआईपी पार्टी के मुकेश सहनी भी कांग्रेस से ज़्यादा राजद के करीबी माने जाते हैं।
सहमति के बिना नहीं बनेगी रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अब मुख्यमंत्री पद या सीट बंटवारे को लेकर जल्दबाज़ी में समझौता नहीं करना चाहती। वह रणनीति अपने हाथ में रखना चाहती है और आगे चलकर “बड़े भाई की भूमिका” में रहने की कोशिश में है।
वहीं, राजद इस बात को लेकर स्पष्टता चाहता है कि तेजस्वी यादव ही महागठबंधन का चेहरा होंगे या नहीं।
