
आईपीएस वाई पूरन कुमार की मौत ने हरियाणा पुलिस तंत्र की अंदरूनी राजनीति, जातिगत भेदभाव और सरकारी संवेदनहीनता को एक बार फिर से सामने ला खड़ा किया है। 7 अक्टूबर 2025 को उनका शव उनके चंडीगढ़ स्थित घर में पाया गया, जेब में आठ पेज का सुसाइड नोट मिला जिसमें कई वरिष्ठ अधिकारियों पर दबाव, उत्पीड़न, जातिगत पक्षपात, और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप खुले तौर पर दर्ज थे। उन्होंने यह लिखा कि बार-बार उच्च अधिकारियों को शिकायत के बावजूद उनकी न तो कभी सुनवाई हुई और न ही समस्या का हल निकाला गया। सरकार और पुलिस विभाग हर कदम पर मामले को दबाता दिखा—पोस्टमार्टम तक में सप्ताह भर की देरी कर दी गई, जिससे परिवार का आक्रोश और बढ़ गया।पूरन कुमार का परिवार लगातार प्रशासन से संबंधित अफसरों की गिरफ्तारी, सस्पेंशन और निष्पक्ष जांच की मांग करता रहा, लेकिन बार-बार सरकारी रवैया ठंडा ही बना रहा। राज्यपाल तक को हस्तक्षेप करना पड़ा, मगर परिणाम वही शून्य रहा। पूरे राज्य में यह संदेश गया कि व्यवस्था बदलाव को तैयार ही नहीं और अधिकारी स्वयं ही असहाय हो चुके हैं। असल चुनौती तो तब और विकराल हो जाती है, जब इसी प्रकरण की जांच कर रहे एएसआई संदीप लाठर की भी संदिग्ध परिस्थितियों में आत्महत्या हो जाती है और उसके नोट में भी पुलिस सिस्टम की भयावह हकीकत सामने आती है। धीरे-धीरे राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप, परिवार की अंतरात्मा की आवाज और मीडिया की चीख सबकुछ एक सरकारी नाकामी की गवाही बन जाती है।पूरा घटनाक्रम अंततः यह दिखाता है कि हमारा सिस्टम अब भी जातिभेद, राजनीति और संवेदनहीनता की जंजीरों में बंधा है, जहां न तो अधिकारी सुरक्षित हैं, न ही उनके परिवार। हफ्तों तक लाश पोस्टमार्टम के लिए इंतजार करती रहती है, मीडिया में रोज़-रोज़ नए खुलासे आते हैं और परिवार दर-दर की ठोकरें खाते हुए न्याय के लिए चिल्लाता रह जाता है। पूरन कुमार की यह कहानी एक व्यक्ति की मौत भर नहीं, प्रशासनिक और सामाजिक अंतरात्मा के मृत पड़ जाने की भी कहानी है, जिसमें हिरासत, सुरक्षा, इंसाफ, भरोसा—सब धीरे-धीरे दम तोड़ देते हैं…
