
हिमाचल प्रदेश में बाढ़ और भूस्खलन से हुई तबाही को सिर्फ प्रकृति का कहर कहना सच से आँखें चुराना है। असली वजह है प्रदेश में वर्षों से चला आ रहा अवैज्ञानिक और अवैध खनन, जिसे सरकारें देखती रहीं लेकिन रोक नहीं पाईं। नदियों और खड्डों को खोखला करने वाले खनन माफिया पर कार्रवाई करने की बजाय उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा। नतीजा यह हुआ कि बरसात में नदियों के रास्ते बदलने लगे और तबाही ने लोगों के घर-आँगन निगल लिए।
रिपोर्टें चेताती रहीं, सरकार टालती रही
आईआईटी पुणे की रिपोर्ट हो या केंद्र से आई आपदा अध्ययन टीम की जांच—सबने साफ कहा कि अवैज्ञानिक खनन ने नुकसान बढ़ाया। विधानसभा से लेकर जिला परिषद तक बार-बार सवाल उठे, लेकिन सरकारें “कार्रवाई” के नाम पर केवल बयान देती रहीं।
खनन माफिया के आगे बेबस व्यवस्थानालागढ़, ऊना और बद्दी जैसे इलाकों में खनन माफिया के हमले तक हो चुके हैं, लेकिन माफिया का नेटवर्क और नेताओं की मिलीभगत इतनी मजबूत है कि हालात जस के तस हैं। फतेहपुर के विधायक तक चेतावनी दे चुके हैं कि पंजाब का खनन माफिया शाहनहर बैराज तक को नुकसान पहुंचा चुका है, लेकिन सरकार का रुख फिर भी ढुलमुल है।
आंकड़े सरकार की नाकामी बयान कर रहे
पिछले दो साल में प्रदेशभर में 23,429 अवैध खनन के मामले दर्ज हुए और लगभग 15 करोड़ का जुर्माना वसूला गया। सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर खनन रुका क्यों नहीं? उद्योग विभाग ने चार महीने में 900 निरीक्षण किए और 895 मामलों में जुर्माना लगाया, यानी अवैध खनन खुलेआम चल रहा है। नई खनिज नीति 2024 लाकर सरकार ने दावा किया कि अब FIR होगी, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और कह रही है।

विशेषज्ञ भी चेतावनी दे रहे
शिमला स्थित आपदा प्रबंधन सेल के विशेषज्ञों का कहना है कि नदियों और सड़कों के किनारे खनन ने बाढ़ और भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ा दिया है। वैज्ञानिकों की ये चेतावनियाँ सालों से अनसुनी की जा रही हैं।

खनियारा की मिसाल, मिलीभगत का सबूत
धर्मशाला के खनियारा क्षेत्र में स्थानीय आयुक्त देवेन खन्ना की रिपोर्ट ने दिखा दिया कि कैसे अधिकारी और खनन माफिया की मिलीभगत से स्लेट पत्थर का अवैध खनन हो रहा है। सरकार को करोड़ों का चूना लगा और किसानों की फसलें बर्बाद हुईं, लेकिन जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई आज तक नहीं हुई।
सरकार की स्वीकारोक्ति भी आधी-अधूरी
मुख्य सचिव ने खुद माना कि आपदा के पीछे अवैज्ञानिक खनन भी बड़ा कारण है। सवाल ये है कि जब सरकार को वजह पता है, तो कार्रवाई कब होगी? या फिर हर बार की तरह “जांच और अध्ययन” के नाम पर फाइलें ही खनन माफिया को बचाती रहेंगी?
