दिल्ली-
स्वतंत्रता दिवस समारोह के मुख्य आयोजन से कांग्रेस के दोनों शीर्ष नेता — लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे — इस बार गैरहाजिर रहे। दोनों ने कांग्रेस मुख्यालय में ध्वजारोहण किया और वहीं स्वतंत्रता दिवस मनाया। इस दौरान राहुल गांधी की बारिश में भीगती तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई, लेकिन यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ कि जब देश का सर्वोच्च समारोह लाल किले पर आयोजित हो रहा था, तब नेता प्रतिपक्ष वहाँ क्यों नहीं पहुंचे?
नेता प्रतिपक्ष की गैरमौजूदगी बनी बहस का विषय

हालांकि कांग्रेस समर्थक यह तर्क दे रहे हैं कि पिछले साल लाल किले पर राहुल गांधी को दूसरी कतार में बैठाया गया था, जो कथित रूप से उनका “अपमान” था। इसी कारण इस बार उन्होंने कार्यक्रम से दूरी बनाई। लेकिन क्या राष्ट्रीय पर्व जैसे अवसर पर व्यक्तिगत सम्मान-अपमान को प्राथमिकता देना एक परिपक्व राजनीतिक व्यवहार कहा जा सकता है?
यदि राहुल गांधी इस साल भी लाल किले के समारोह में
शामिल होते और उन्हें फिर पीछे बैठाया जाता, तो इससे सरकार पर सवाल उठते और एक नैरेटिव बनता कि नेता प्रतिपक्ष होने के बावजूद उन्हें सम्मान नहीं मिला। इससे राहुल की राजनीतिक परिपक्वता और देशभक्ति की छवि मजबूत होती।
कांग्रेस ने गंवाया प्रतीकात्मक राजनीति का मौका
अगर राहुल गांधी और खड़गे दोनों को पिछली कतार में बैठाया जाता, तो कांग्रेस इसे विपक्ष के नेता और एक दलित वरिष्ठ नेता के “संस्थागत अपमान” के रूप में उठाने का मौका बना सकती थी। इससे ना सिर्फ कांग्रेस को नैतिक बढ़त मिलती, बल्कि एक मजबूत जनसंदेश भी निकलता।
लेकिन कार्यक्रम में अनुपस्थित रहकर कांग्रेस ने एक अहम प्रतीकात्मक राजनीतिक अवसर को खो दिया है। अब जो नैरेटिव बन रहा है, वह यह है कि नेहरू-गांधी परिवार प्रोटोकॉल के तहत ‘विशेष स्थान’ चाहता है, और जब वह न मिले तो दूरी बना लेता है।

विशेषाधिकार की बहस फिर सतह पर
राहुल गांधी की अनुपस्थिति को लेकर सरकार समर्थक वर्ग यह प्रश्न उठा रहा है कि क्या हर बार अगली कतार में बैठना गांधी परिवार का जन्मसिद्ध अधिकार है? सोनिया गांधी को अगली पंक्ति में बैठने का विशेषाधिकार इसलिए प्राप्त है क्योंकि वे एक पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी हैं। 2004 में यूपीए सरकार के दौरान नियमों में बदलाव कर पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी को भी वही प्रोटोकॉल देने का प्रावधान जोड़ा गया था।
लेकिन राहुल गांधी, जो स्वयं प्रधानमंत्री नहीं रहे हैं, उनकी अगली कतार की अपेक्षा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। खासकर तब, जब वे नेता प्रतिपक्ष के रूप में स्वयं को जनता से जुड़ा, साधारण छवि वाला राजनेता बताने की कोशिश करते हैं।
