Headlines

हनुमान जी पहले अंतरिक्ष यात्री? बच्चों को तथ्य की जगह कल्पना सिखा रहे हैं भाजपा नेता

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद अनुराग ठाकुर ने हाल ही में एक बच्चों के कार्यक्रम में ऐसा बयान दिया जो आज़ादी के बाद के वैज्ञानिक भारत में गहराई से सोचने को मजबूर करता है। उन्होंने बच्चों से पूछा कि पहला अंतरिक्ष यात्री कौन था, और जब बच्चों ने सही उत्तर “यूरी गैगरिन” दिया, तो उन्होंने उसे खारिज करते हुए कहा, नहीं, पहले अंतरिक्ष यात्री तो हनुमान जी थे।

 

यह कथन निश्चित रूप से वाल्मीकि रामायण में वर्णित उस कथा की ओर इशारा करता है जिसमें बाल हनुमान सूर्य को फल समझकर निगलने के लिए आकाश में उड़ जाते हैं। यह कथा भारतीय आस्था और धार्मिक साहित्य का अभिन्न हिस्सा है, किंतु जब धार्मिक प्रतीकों और कथाओं को वैज्ञानिक तथ्यों के समकक्ष प्रस्तुत किया जाने लगे, तो उससे ना सिर्फ ज्ञान का स्वरूप कमजोर होता है, बल्कि बच्चों और युवाओं के मन में भी भ्रम की स्थिति पैदा होती है।

 

अगर पुराणों और शास्त्रों की बात करें, तो हनुमान जी से पहले भी अनेक देवताओं की स्वर्गलोक से पृथ्वी पर यात्रा और वापसी की कथाएं मिलती हैं। देवता तो स्वयं ‘दिव्य लोकों’ में रहते हैं, जो कि एक आध्यात्मिक अवधारणा है, ना कि वैज्ञानिक रूप से मापा जा सकने वाला अंतरिक्ष। ऐसे में सिर्फ हनुमान जी को पहले अंतरिक्ष यात्री बताना और फिर उसे बच्चों को “तथ्य” के रूप में परोसना न केवल अज्ञान का प्रतीक है बल्कि धार्मिक साहित्य की गरिमा को भी सामान्यीकृत करने की एक कोशिश लगती है।

 

यही नहीं, वर्षों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सार्वजनिक मंच से कहा था कि भगवान शिव पहले प्लास्टिक सर्जन थे, क्योंकि उन्होंने गणेश जी को हाथी का सिर लगाया था। सवाल यह नहीं कि आस्था पर भरोसा है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हम चमत्कारिक घटनाओं को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर तौलकर अपने ईश्वर को सीमित कर रहे हैं?

जब कोई देवता, जिन्हें करोड़ों लोग सर्वशक्तिमान मानते हैं, को “स्पेस ट्रैवलर” या “सर्जन” जैसे पदों से जोड़ते हैं, तो कहीं ना कहीं उनका दिव्य स्वरूप, जिसे श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक माना जाता है, उसे मानव कर्मों की सीमाओं में बाँध दिया जाता है। इससे देवताओं की गरिमा बढ़ती नहीं, बल्कि कमज़ोर होती है।

 

आख़िर में, यह सोचने का विषय है कि क्या बच्चों को विज्ञान और धार्मिक आख्यानों के बीच फर्क समझाना ज़रूरी नहीं है? क्या जरूरी नहीं कि हम अपनी आस्था को विज्ञान से बेहतर ढंग से अलग करके, दोनों को उनकी अपनी गरिमा में समझने दें?

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *